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| बेरी तेरी कम्बल सौतनिया मुझे जलाये रे,,, चित से तेरी लिपटी मेरे मन को सताये रे,,,,। जलत मन विहर सांस न कि। तेरे तन से लिपट जाए रे,,,, तड़पे साँसे तरसे साँसे तेरे छुवन को कहे नही छू पाए रे,,, बेरी सौतनिया तेरी कम्बल चित से लिपटी जाये रे। पख पे ये पापी बंदिश मेरे को सताये रे पख छुवन को चंचल मनवा सांसो को सिहरे रे तड़पत मनवा जलत तनवा बेरी कम्बल सौतनिया जियरा मोर जराए रे। कहे के सावन ई बरसे,,,, कहे के पुरवइया सन सन तरपाये रे.......... कहे को बिजली चमके कहे को बादल गरज़ के जिया मोर धरकाये रे बेरी सौतनिया तेरी कम्बल चित से लग तेरी , मेरी जलन बढ़ाये रे,, समुन्द्र से उफान पे,,, जवाला धधकी है तूफान से,,, तन विहर आग में जलती जाए रे,,,, कहे को ई सावन बरसे , कहे को पुरवईया सन सनसनए रे पानी बरसी है गगन से प्यास उठी है मोरे मन मे। कल्पना करने की लगी राह मन मे। बरसे बारिस गगन में , चाह मेरे मन मे।। कुछ अंधेरा , कुछ उजाला , क्या समा है मदहोश हो जाऊं तेरे आगोस में रब कहत सब छामा है बून्द गिरे तेरे योवन में आ फाँसी तेरे नभ में अंकुर मेरा मन फुट जाए रे, तलब मुझे प्यास लबो को ली भींगये रे। बुँदे तेरे तन पे बिखरी पड़ी,,,,,, कस मैं भी बिखर जाऊं रे,,,,,, बेरी सौतनिया कम्बल तेरी, चित से लग मुझे जलाये रे,, |
Monday, January 8, 2018
बेरी सौतनिया कम्बल तेरी
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